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Free article · Vishnu Ji · 6 min read

ॐ जय जगदीश हरे आरती: पूरे बोल और अर्थ

घर-घर गाई जाने वाली इस आरती के पूरे बोल, हर पद का सरल अर्थ, रचयिता का परिचय और घर पर आरती करने की विधि।

By DevGranth · 5 November 2026

यह आरती किसने लिखी

‘ॐ जय जगदीश हरे’ शायद भारत के घरों में सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली आरती है। पूजा किसी भी देवता की हो, बहुत से परिवार अंत में यही आरती गाते हैं।

इसकी रचना 19वीं सदी में पंजाब के फिल्लौर के पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने की थी। वे विद्वान, कथावाचक और हिंदी-पंजाबी के लेखक थे। ‘जगदीश’ का अर्थ है जगत के ईश्वर, यानी भगवान विष्णु, इसलिए यह आरती विशेष रूप से विष्णु जी और उनके अवतारों की पूजा में गाई जाती है।

आरती के पूरे बोल और अर्थ

हर पद के बाद ‘ॐ जय जगदीश हरे’ दोहराया जाता है। नीचे बोल वैसे ही दिए हैं जैसे ज़्यादातर घरों में गाए जाते हैं, और साथ में हर पद का सरल अर्थ।

पहला पद
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥ ॐ जय जगदीश हरे॥

अर्थ: हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो। आप अपने भक्तों और सेवकों के संकट पल भर में दूर कर देते हैं।

दूसरा पद
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का, स्वामी दुख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

अर्थ: जो आपका ध्यान करता है, उसे फल मिलता है और मन का दुःख मिटता है। भक्त यह भाव रखते हैं कि आपकी कृपा से घर में सुख-शांति आती है और तन के कष्ट हल्के होते हैं।

तीसरा पद
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥

अर्थ: आप ही मेरे माता-पिता हैं; मैं और किसकी शरण लूँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं, जिससे मैं आशा रखूँ।

चौथा पद
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥

अर्थ: आप पूर्ण परमात्मा हैं और सबके मन की बात जानते हैं। आप ही परब्रह्म परमेश्वर और सबके स्वामी हैं।

पाँचवाँ पद
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता। मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥

अर्थ: आप करुणा के सागर और सबका पालन करने वाले हैं। मैं नासमझ हूँ और फल की इच्छा रखता हूँ; मैं सेवक हूँ, आप स्वामी हैं। हे पालनहार, मुझ पर कृपा कीजिए।

छठा पद
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

अर्थ: आप एक हैं, इंद्रियों से दिखाई नहीं देते, और सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयालु, मैं कम बुद्धि वाला किस तरह आपसे मिलूँ?

सातवाँ पद
दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

अर्थ: आप दीनों के मित्र और दुःख हरने वाले हैं, आप ही मेरे ठाकुर और रक्षक हैं। अपना हाथ बढ़ाकर मुझे अपनी शरण में ले लीजिए; मैं आपके द्वार पर खड़ा हूँ।

आठवाँ पद
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥

अर्थ: हे देव, मेरे मन के लोभ और विकार मिटाइए, मेरी गलतियाँ क्षमा कीजिए। मेरी श्रद्धा और भक्ति बढ़ाइए और संतों की सेवा का भाव दीजिए।

अंतिम पद (कई घरों में गाया जाता है)
तन मन धन सब है तेरा, स्वामी सब कुछ है तेरा। तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा॥

अर्थ: मेरा तन, मन और धन सब आपका ही है। आपकी चीज़ आपको ही अर्पित कर रहा हूँ, इसमें मेरा क्या लगता है।

आरती का मूल भाव

इस आरती में कोई बड़ी माँग नहीं है। पहले भगवान की महिमा है, फिर भक्त अपनी कमज़ोरी मान लेता है (‘मैं मूरख’, ‘मैं कुमति’), और अंत में सब कुछ भगवान को सौंप देता है। यही कारण है कि यह आरती हर उम्र के लोगों को अपनी लगती है: इसमें डर नहीं, भरोसा है।

जब अगली बार आरती गाएँ, तो ‘मात पिता तुम मेरे’ और ‘तेरा तुझको अर्पण’ जैसी पंक्तियों पर एक पल रुककर उनका अर्थ याद करें। आरती का आनंद कई गुना बढ़ जाता है।

आरती की थाली में क्या रखें

  • घी का दीपक (एक बत्ती या पाँच बत्तियों वाला) या कपूर।
  • रोली, अक्षत (साबुत चावल) और फूल।
  • धूप या अगरबत्ती।
  • छोटी घंटी, अगर घर में हो।
  • भोग के लिए मिठाई, फल या मिश्री; विष्णु पूजा में तुलसी दल रखना शुभ माना जाता है।
  • जल का लोटा, आरती के बाद जल घुमाने के लिए।

घर पर आरती कैसे करें

  1. 1पूजा पूरी होने के बाद हाथ धोकर दीपक या कपूर जलाएँ।
  2. 2थाली को दोनों हाथों से पकड़कर भगवान के सामने खड़े हों; परिवार के बाकी लोग ताली या घंटी से साथ दें।
  3. 3थाली को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाएँ। प्रचलित तरीका है: चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार, और फिर पूरे विग्रह के सामने सात बार।
  4. 4आरती पूरी गाएँ, जल्दी में पद न छोड़ें।
  5. 5अंत में थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर नीचे छोड़ दें।
  6. 6सब लोग दीपक की लौ पर हाथ घुमाकर आँखों और सिर से लगाएँ, फिर प्रसाद बाँटें।

आरती से जुड़ी कुछ आम बातें

  • आरती पूजा के अंत में की जाती है, जब भोग लग चुका हो। माना जाता है कि पूजा में कोई कमी रह गई हो तो आरती से वह पूरी हो जाती है।
  • आरती खड़े होकर की जाती है; जो खड़े न हो सकें, वे बैठकर भी कर सकते हैं।
  • आरती का दीपक फूँक मारकर नहीं बुझाया जाता; उसे अपने आप शांत होने दें या हाथ की हवा से बुझाएँ।
  • अगर पूरी आरती याद न हो, तो फ़ोन या पुस्तक से देखकर गाने में कोई दोष नहीं। धीरे-धीरे अपने आप याद हो जाएगी।
  • बच्चों को आरती के समय घंटी या ताली की ज़िम्मेदारी दें; इसी तरह वे बोल और भाव दोनों सीखते हैं।

बाकी आरतियाँ भी अर्थ सहित

ॐ जय जगदीश हरे के साथ गणेश जी, शिव जी, दुर्गा माँ, लक्ष्मी जी, हनुमान जी और दूसरी प्रमुख आरतियों के पूरे बोल और अर्थ हमारी ई-बुक ‘आरती संग्रह’ में हैं। विष्णु जी की पूजा से जुड़ी एकादशी व्रत कथाएँ और सत्यनारायण कथा विष्णु पैक में मिलती हैं।

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