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एकादशी व्रत के नियम: क्या खाएँ, क्या न खाएँ, पारण कब करें
एकादशी व्रत के प्रकार, फलाहार में क्या लें, किन चीज़ों से बचें और द्वादशी को पारण कब और कैसे करें, सब एक जगह।
By DevGranth · 3 November 2026

एकादशी व्रत क्या है
हर चंद्र मास के दोनों पक्षों (शुक्ल और कृष्ण) की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहते हैं। इस तरह साल में आम तौर पर 24 एकादशियाँ आती हैं, और अधिक मास वाले साल में 26। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है।
एक बात पहले ही समझ लें: एकादशी की तारीख और पारण का समय हर पंचांग और हर शहर में थोड़ा अलग हो सकता है, क्योंकि तिथि सूर्योदय और चंद्रमा की गति पर निर्भर करती है। कभी-कभी एकादशी दो दिन की भी बताई जाती है। इसलिए अपने शहर का पंचांग या मंदिर की सूचना देखकर ही दिन तय करें।
एकादशी केवल खाने-पीने का नियम नहीं है। परंपरा में इस दिन मन और वाणी पर भी संयम रखने को कहा गया है: क्रोध, झूठ, निंदा और कटु वचन से बचें, दिन में सोने से बचें, और समय भजन, कथा या अच्छी पुस्तक पढ़ने में लगाएँ। यही इस व्रत का असली सार है।
व्रत के प्रकार
हर कोई एक जैसा व्रत नहीं रख सकता, और परंपरा में इसके कई रूप स्वीकार किए गए हैं:
- निर्जला: पूरे दिन बिना अन्न और जल के। यह सबसे कठिन है; निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल) पर बहुत लोग इसे रखते हैं।
- जलाहार: केवल जल, या जल और दूध।
- फलाहार: फल, दूध और व्रत में खाई जाने वाली चीज़ें। ज़्यादातर लोग यही व्रत रखते हैं।
- एक समय भोजन: दिन में एक बार सात्विक फलाहारी भोजन।
क्या खा सकते हैं
- सभी ताज़े फल और सूखे मेवे।
- दूध, दही, छाछ, पनीर और घी।
- साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा और समा के चावल (व्रत वाले चावल)।
- आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू और लौकी जैसी सब्ज़ियाँ (कई परिवार कुछ सब्ज़ियाँ नहीं लेते, अपनी परंपरा देखें)।
- मखाना और मूँगफली।
- साधारण नमक की जगह सेंधा नमक; काली मिर्च और जीरा।
- पानी, नारियल पानी और नींबू पानी, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी कोई चीज़। एकादशी पर चावल न खाने का नियम सबसे ज़्यादा माना जाता है।
- गेहूँ, जौ, मक्का जैसे अनाज और सभी दालें।
- प्याज़, लहसुन और मांसाहार।
- साधारण (आयोडीन वाला) नमक, हल्दी और गरम मसाले (कई घरों में)।
- पैकेट वाले नमकीन और बाहर का तला-भुना खाना, जिसमें अनाज या साधारण नमक हो सकता है।
- शराब और तंबाकू।
दशमी से द्वादशी तक: पूरा क्रम
- 1दशमी (एक दिन पहले): शाम को हल्का, सात्विक भोजन लें और सूर्यास्त के बाद अनाज न खाएँ। मन में व्रत का संकल्प कर लें।
- 2एकादशी की सुबह: स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें। पीले फूल, तुलसी दल, धूप-दीप और फल अर्पित करें। हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
- 3दिन में: ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें, और उस एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- 4ध्यान रखें: एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते, इसलिए पूजा के लिए पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
- 5शाम को: आरती करें। कई भक्त रात में भजन-कीर्तन करते हैं; यह अपनी क्षमता पर है।
- 6द्वादशी: पंचांग में दिए पारण समय में व्रत खोलें (नीचे देखें)।
पारण कब और कैसे करें
एकादशी व्रत खोलने को ‘पारण’ कहते हैं। यह अगले दिन, यानी द्वादशी को, सूर्योदय के बाद किया जाता है। पंचांग में हर एकादशी के लिए पारण का समय अलग से लिखा होता है; उसी समय के भीतर व्रत खोलें। परंपरा में द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले पारण कर लेना ज़रूरी माना गया है, और द्वादशी के पहले चौथाई भाग (जिसे हरि वासर कहते हैं) में पारण नहीं किया जाता।
पारण से पहले भगवान विष्णु को भोग लगाएँ। बहुत से घरों में पारण चावल या तुलसी दल और जल से किया जाता है, और फिर सामान्य सात्विक भोजन लिया जाता है। हो सके तो किसी ज़रूरतमंद को भोजन या अनाज का दान करें।
किसे सावधानी रखनी चाहिए
व्रत श्रद्धा का विषय है, शरीर को कष्ट देने का नहीं। गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे, डायबिटीज़ या बीपी जैसी बीमारी वाले, और जो रोज़ दवा लेते हैं, वे निर्जला व्रत न रखें; फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखें और पहले डॉक्टर से पूछ लें। परंपरा में भी ऐसे लोगों के लिए छूट मानी गई है।
अगर किसी कारण व्रत टूट जाए, तो घबराएँ नहीं। भगवान से क्षमा माँगकर अगली एकादशी को फिर से रखें; भाव सबसे बड़ा है।
हर एकादशी की कथा
हर एकादशी का अपना नाम, अपनी कथा और अपना महत्व है, जैसे देवउठनी, मोक्षदा या निर्जला एकादशी। साल की सभी 24 एकादशियों की पूरी विधि और कथा हमारी ई-बुक ‘एकादशी व्रत कथा’ में है। सत्यनारायण कथा भी साथ चाहिए, तो दोनों विष्णु पैक में एक साथ मिलती हैं।
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