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गायत्री मंत्र का अर्थ: शब्द-दर-शब्द
गायत्री मंत्र के हर शब्द का अर्थ, पूरे मंत्र का भाव और जप की पारंपरिक विधि, सरल हिंदी में।
By DevGranth · 4 November 2026

गायत्री मंत्र
गायत्री मंत्र ऋग्वेद के तीसरे मंडल (3.62.10) का मंत्र है, जिसके ऋषि विश्वामित्र माने जाते हैं। इसके देवता सविता यानी सूर्य के प्रेरक तेज हैं, और यह ‘गायत्री’ छंद में है, इसी से इसका नाम पड़ा। जप में इसके आगे ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ जोड़ा जाता है।
यह मंत्र छोटा है, पर इसकी प्रार्थना बहुत बड़ी है: इसमें धन या कोई वस्तु नहीं, बल्कि अच्छी बुद्धि माँगी गई है।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम उस परमात्मा के श्रेष्ठ, पवित्र तेज का ध्यान करते हैं जो पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग में व्याप्त है और सबको प्रेरणा देता है। वह हमारी बुद्धि को सही मार्ग की ओर प्रेरित करे।
शब्द-दर-शब्द अर्थ
- ॐ: परमात्मा का सबसे पवित्र नाम, हर मंत्र का आरंभ।
- भूः: पृथ्वी लोक; प्राण और अस्तित्व का प्रतीक।
- भुवः: अंतरिक्ष, यानी पृथ्वी और आकाश के बीच का लोक।
- स्वः: स्वर्ग लोक, प्रकाश और आनंद का प्रतीक।
- तत्: वह (परमात्मा)।
- सवितुः: सविता का, यानी सबको जन्म देने और प्रेरित करने वाले सूर्य-रूप देव का।
- वरेण्यम्: वरण करने योग्य, सबसे श्रेष्ठ।
- भर्गः: तेज, जो अज्ञान और दोषों को जला दे।
- देवस्य: देव का, दिव्य शक्ति का।
- धीमहि: हम ध्यान करते हैं, मन में धारण करते हैं।
- धियः: बुद्धियाँ, हमारी सोच।
- यः: जो।
- नः: हमारी।
- प्रचोदयात्: प्रेरित करे, सही दिशा में आगे बढ़ाए।
पूरा अर्थ, सरल शब्दों में
मंत्र के दो हिस्से हैं। पहले हिस्से में साधक कहता है कि हम उस दिव्य तेज का ध्यान करते हैं जो तीनों लोकों में फैला है और सबसे श्रेष्ठ है। दूसरे हिस्से में प्रार्थना है: वह तेज हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
ध्यान देने वाली बात है ‘नः’, यानी ‘हमारी’। प्रार्थना सिर्फ़ अपने लिए नहीं, सबकी बुद्धि के लिए है। इसीलिए गायत्री मंत्र को सामूहिक प्रार्थना भी कहा जाता है: सब सही सोचें, सब सही राह पर चलें।
सूर्य का उदाहरण भी सुंदर है। जैसे सूर्य बिना भेदभाव के सबको रोशनी देता है, वैसे ही साधक माँगता है कि भीतर का अँधेरा, यानी भ्रम और गलत सोच, उस प्रकाश से दूर हो।
जप की पारंपरिक विधि
परंपरा में गायत्री जप को संध्या-वंदन का हिस्सा माना गया है। अलग-अलग परिवारों और संप्रदायों के नियम थोड़े अलग हो सकते हैं, इसलिए अपने घर के बड़ों या गुरु की बात को प्राथमिकता दें। आम तौर पर यह क्रम अपनाया जाता है:
- 1समय: सूर्योदय, दोपहर और सूर्यास्त, ये तीन संध्याएँ पारंपरिक समय हैं। रोज़ एक समय भी निभाएँ तो काफ़ी है।
- 2स्नान या हाथ-मुँह धोकर साफ़ जगह पर आसन बिछाएँ। सुबह पूर्व की ओर और शाम को पश्चिम की ओर मुँह करके बैठने की परंपरा है।
- 3रीढ़ सीधी रखें, आँखें बंद करें और कुछ गहरी साँसें लेकर मन शांत करें।
- 4रुद्राक्ष या तुलसी की माला से 108 बार जप करना प्रचलित है; शुरुआत 11 या 27 बार से भी कर सकते हैं।
- 5जप मन में, होंठ हिलाकर धीमे स्वर में, या उच्च स्वर में किया जा सकता है। उच्चारण साफ़ और धीमा रखें।
- 6जप के बाद एक-दो मिनट चुप बैठें और मंत्र के अर्थ पर ध्यान करें।
कुछ बातें जो ध्यान रखें
- गिनती से ज़्यादा ज़रूरी है ध्यान। जल्दी-जल्दी 108 बार बोलने से अच्छा है धीरे-धीरे 11 बार अर्थ के साथ।
- उच्चारण सीखने के लिए किसी जानकार से सुनकर अभ्यास करें; ‘वरेण्यं’ और ‘प्रचोदयात्’ पर विशेष ध्यान दें।
- मंत्र को डर या दबाव से नहीं, श्रद्धा से जपें। एक दिन छूट जाए तो अगले दिन फिर शुरू करें।
- जप को किसी इच्छा पूरी होने की शर्त न बनाएँ; इसकी प्रार्थना ही अच्छी बुद्धि की है।
बच्चों को गायत्री मंत्र कैसे सिखाएँ
- 1पहले मंत्र को चार छोटे टुकड़ों में बाँटें: ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’, ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’, ‘भर्गो देवस्य धीमहि’, ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’।
- 2रोज़ एक टुकड़ा धीरे-धीरे बोलकर दोहरवाएँ; जब वह साफ़ हो जाए, तब अगला जोड़ें।
- 3साथ में हर टुकड़े का एक लाइन का अर्थ बताएँ, जैसे ‘हम भगवान के प्रकाश का ध्यान करते हैं’।
- 4सुबह स्कूल जाने से पहले परिवार के साथ तीन बार मंत्र बोलने की आदत डालें।
- 5गलती होने पर टोकें नहीं, अगली बार सही उच्चारण के साथ फिर से बोलकर सुनाएँ। प्यार से सीखा मंत्र जीवन भर याद रहता है।
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