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हनुमान चालीसा का अर्थ: हर चौपाई सरल हिंदी में
दोनों दोहे, चालीसों चौपाइयाँ और समापन दोहा, हर एक का सरल हिंदी अर्थ। साथ में घर पर पाठ करने का आसान तरीका।
By DevGranth · 6 November 2026

हनुमान चालीसा क्या है
हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना है, जो अवधी भाषा में लिखी गई है। इसमें शुरुआत में दो दोहे, फिर चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है। ‘चालीसा’ नाम इन्हीं चालीस चौपाइयों से आया है।
बहुत से लोग इसे बचपन से याद करके रोज़ पढ़ते हैं, पर हर पंक्ति का अर्थ कम ही लोग जानते हैं। जब अर्थ मन में हो, तो पाठ सिर्फ़ शब्द नहीं रहता, एक बातचीत बन जाता है। नीचे हर दोहे और चौपाई के साथ उसका सरल अर्थ दिया है।
आरंभ के दोहे
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
अर्थ: गुरु के चरण-कमलों की धूल से अपने मन रूपी दर्पण को साफ़ करके मैं श्रीराम के निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों फल देने वाला है।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥
अर्थ: अपने को बुद्धि में कमज़ोर जानकर मैं पवनपुत्र हनुमान जी का स्मरण करता हूँ। हे प्रभु, मुझे बल, बुद्धि और विद्या दीजिए और मेरे दुःख व मन के दोष दूर कीजिए।
चौपाई 1 से 10: हनुमान जी का रूप और गुण
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
अर्थ: हे हनुमान जी, आपकी जय हो! आप ज्ञान और गुणों के सागर हैं। हे वानरों के स्वामी, आपकी कीर्ति तीनों लोकों में फैली है।
राम दूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा॥
अर्थ: आप श्रीराम के दूत और अपार बल के भंडार हैं। आपको अंजनी-पुत्र और पवनसुत के नाम से जाना जाता है।
महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी॥
अर्थ: आप महावीर, पराक्रमी और वज्र जैसे मज़बूत अंगों वाले हैं। आप बुरी सोच को दूर करते हैं और अच्छी बुद्धि वालों के साथी हैं।
कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा॥
अर्थ: आपका रंग सोने जैसा है और आप सुंदर वेश में शोभित हैं। कानों में कुंडल हैं और बाल घुँघराले हैं।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। काँधे मूँज जनेऊ साजै॥
अर्थ: आपके हाथों में वज्र और ध्वजा शोभा देते हैं, और कंधे पर मूँज का जनेऊ सजा है।
संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बंदन॥
अर्थ: आप भगवान शंकर के अंश और वानरराज केसरी के पुत्र हैं। आपके तेज और प्रताप को सारा संसार नमन करता है।
बिद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर॥
अर्थ: आप विद्वान, गुणवान और बहुत चतुर हैं, और श्रीराम का काम करने को सदा उत्सुक रहते हैं।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया॥
अर्थ: प्रभु श्रीराम की कथा सुनने में आपको आनंद आता है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी आपके मन में बसते हैं।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥
अर्थ: आपने छोटा रूप धरकर अशोक वाटिका में सीता जी को दर्शन दिए और विशाल रूप धरकर लंका जलाई।
भीम रूप धरि असुर सँहारे। रामचंद्र के काज सँवारे॥
अर्थ: आपने भयंकर रूप धरकर राक्षसों का संहार किया और श्रीरामचंद्र जी के सब काम पूरे किए।
चौपाई 11 से 20: रामायण के प्रसंग
लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये॥
अर्थ: आप संजीवनी बूटी लाए और लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। इससे प्रसन्न होकर श्रीराम ने आपको हृदय से लगा लिया।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
अर्थ: श्रीराम ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा कि तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
अर्थ: ‘हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाते हैं’, यह कहकर श्रीराम ने आपको गले से लगा लिया।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते। कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते॥
अर्थ: सनक आदि ऋषि, ब्रह्मा आदि देव, बड़े मुनि, नारद, सरस्वती, शेषनाग, यमराज, कुबेर और दिशाओं के रक्षक भी आपका यश पूरा नहीं कह पाते, तो कवि और विद्वान कैसे कहेंगे?
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
अर्थ: आपने सुग्रीव पर उपकार किया: उन्हें श्रीराम से मिलाया और राजा का पद दिलाया।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना॥
अर्थ: विभीषण ने आपकी सलाह मानी और लंका के राजा बने, यह सारा संसार जानता है।
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
अर्थ: जो सूर्य हज़ारों योजन दूर है, उसे आपने बचपन में मीठा फल समझकर निगल लिया था।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥
अर्थ: प्रभु की अँगूठी मुँह में रखकर आप समुद्र लाँघ गए; आपके लिए इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
अर्थ: संसार के जितने भी कठिन काम हैं, आपकी कृपा से वे सब आसान हो जाते हैं।
चौपाई 21 से 30: शरण और रक्षा
राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
अर्थ: आप श्रीराम के द्वार के रखवाले हैं; आपकी आज्ञा के बिना वहाँ कोई प्रवेश नहीं कर पाता। भाव यह है कि राम तक पहुँचने का रास्ता हनुमान जी की भक्ति से होकर जाता है।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रच्छक काहू को डर ना॥
अर्थ: जो आपकी शरण में आता है, उसे सब सुख मिलते हैं। जब आप रक्षक हैं, तो किसी बात का डर कैसा?
आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हाँक तें काँपै॥
अर्थ: अपने तेज को आप ही सँभाल सकते हैं; आपकी एक हुंकार से तीनों लोक काँप उठते हैं।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥
अर्थ: जहाँ महावीर का नाम लिया जाता है, वहाँ बुरी शक्तियाँ पास नहीं आतीं। बहुत से भक्त इसे मन के भीतर के डर से मुक्ति के रूप में भी समझते हैं।
नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
अर्थ: भक्तों की आस्था है कि वीर हनुमान का निरंतर जप रोग और पीड़ा हरता है। नाम-स्मरण मन को धीरज देता है; बीमारी में डॉक्टर की सलाह भी उतनी ही ज़रूरी है।
संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥
अर्थ: जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, हनुमान जी उसे संकट से छुड़ाते हैं।
सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा॥
अर्थ: तपस्वी राजा श्रीराम सबसे ऊपर हैं, और उनके सारे काम आपने ही सँवारे।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै॥
अर्थ: जो भी अपनी मनोकामना लेकर आपके पास आता है, वह जीवन का अनंत फल पाता है, ऐसा भक्तों का विश्वास है।
चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा॥
अर्थ: चारों युगों में आपका प्रताप है, और आपकी कीर्ति से सारा जगत रोशन है।
साधु संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे॥
अर्थ: आप साधु-संतों के रक्षक, असुरों का नाश करने वाले और श्रीराम के दुलारे हैं।
चौपाई 31 से 40 और समापन दोहा
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता॥
अर्थ: माता सीता ने आपको यह वरदान दिया है कि आप आठ सिद्धियाँ और नौ निधियाँ देने वाले बनें।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा॥
अर्थ: आपके पास राम-नाम रूपी रसायन है, और आप सदा श्रीराम के सेवक बने रहते हैं।
तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुख बिसरावै॥
अर्थ: आपका भजन करने से श्रीराम मिलते हैं और जन्म-जन्म के दुःख भूल जाते हैं।
अंत काल रघुबर पुर जाई। जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई॥
अर्थ: ऐसा भक्त अंत समय में श्रीराम के धाम जाता है, और जहाँ भी जन्म ले, हरि-भक्त कहलाता है।
और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई॥
अर्थ: मन में किसी और देवता का ध्यान न भी हो, तो भी हनुमान जी की सेवा से सब सुख मिल जाते हैं।
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
अर्थ: जो बलवीर हनुमान का स्मरण करता है, उसके संकट कटते हैं और पीड़ा मिटती है।
जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
अर्थ: हे स्वामी हनुमान, आपकी बार-बार जय हो! आप गुरु की तरह मुझ पर कृपा कीजिए।
जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई॥
अर्थ: जो इसका सौ बार पाठ करता है, वह बंधनों से छूटकर बड़ा सुख पाता है। भक्त ‘बंधन’ को मोह और चिंता के बंधन के रूप में भी समझते हैं।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
अर्थ: जो यह हनुमान चालीसा पढ़ता है, उसका पाठ सफल होता है; इसके साक्षी स्वयं भगवान शिव हैं।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥
अर्थ: तुलसीदास कहते हैं कि मैं सदा हरि का सेवक हूँ। हे नाथ, मेरे हृदय में निवास कीजिए।
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
अर्थ: हे पवनपुत्र, आप संकट हरने वाले और मंगल के रूप हैं। हे देवताओं के राजा, आप श्रीराम, लक्ष्मण और सीता जी के साथ मेरे हृदय में बसिए।
पाठ कैसे करें
हनुमान चालीसा के पाठ के लिए कोई कठिन नियम नहीं है; सबसे ज़रूरी है साफ़ मन और श्रद्धा। फिर भी घरों में जो सरल क्रम प्रचलित है, वह यह है:
- 1स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। सुबह या शाम, जो समय रोज़ निभा सकें, वही चुनें।
- 2पूजा स्थान पर हनुमान जी या श्रीराम दरबार की तस्वीर के सामने आसन बिछाकर बैठें।
- 3दीपक जलाएँ और चाहें तो फूल, गुड़-चना या कोई भी सात्विक भोग रखें।
- 4पहले श्रीराम का नाम लें, फिर दोनों दोहों से पाठ शुरू करें।
- 5चौपाइयाँ धीरे और साफ़ उच्चारण से पढ़ें; जल्दी पूरा करने से ज़्यादा ज़रूरी है अर्थ के साथ पढ़ना।
- 6समापन दोहे के बाद हनुमान जी की आरती करें और भोग सबमें बाँटें।
- 7मंगलवार और शनिवार को बहुत से लोग विशेष पाठ करते हैं, पर पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है।
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यहाँ हमने हर चौपाई का छोटा अर्थ दिया है। हर शब्द का अर्थ, चौपाइयों के पीछे की रामायण की कथाएँ और पाठ की पूरी विधि हमारी ई-बुक ‘हनुमान चालीसा: विस्तृत व्याख्या और पाठ विधि’ में है। सुंदरकांड और बजरंग बाण भी पढ़ना चाहें, तो ये सब हनुमान पैक में एक साथ मिलते हैं।
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